Saturday, May 14, 2011

खेल










वो झुला है यहाँ,
चाहो तो छोटा
या फ़िर बड़ासा

बहोत सारे हरे कंचे
दो चार लाल पिले,
कुछ सफ़ेद वाले

चक्कर खाता हिंडोला
या फ़िर टेढ़ामेढ़ा भूलभुलैय्या..
बीचमें भटक जाए तो भी
ख़ोनेका मज़ा आता हैं

गुलेल तो जैसे
हाथ हाथोंमें लेकर घुमता हुआ
बचपनका जिगरी दोस्त हो कोई..

या फ़िर पतंग ढेरसारे
किसी तितली को उड़ा रहे हो जैसे
हमारी तिख़ी डोरसे
कट जाता है हाथ कभी लेकीन
छत से गुजरता फटा पन्ना देख़,
क्या रुख्सार लेकर आता है..

किन्ने खेल हैं यहाँ खेलनेको फ़िरभी..
ज़िंदगी को इन्सानही क्यों पसंद आता है?


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