Friday, April 22, 2011




















औज़र कोई
तरकीब कोई
न जाने कहाँ क्या अटका है
न जाने कहाँ क्या ’जाम’ हुआ
ये रात कि बंद होती ही नहीं
ये दिन है कि उफ़ खुलता ही नहीं

औज़र कोई
तरकीब कोई

-गुलज़ार(पुख़राज)

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