Thursday, January 27, 2011

Victim

दर्दके साएँ आँखोमें लेकर

कितने दिनों बाद घरसे बाहर निकला था वो

राहें तो वही पड़ी पड़ी सो रही थी

वो उनकी नींदे कुचलकर चल रहा था

बीचमेंही कही मुड़ जाता था

जैसे करवट ले ली हो नींदमें

थके पैरोंने रुकनेकी इज़ाज़त माँगी,

तो रुक गया वो..

सामने देखा, मंदीर था, भीड़ थी

दुख़ियारे मन को चैन की जरुरत थी

उसने भगवानको कोसा, ख़ुदको कोसा,

कुछ खोखली आँहे भरी और टिका लगाकर बाहर निकला

किसी पहचानवालेने हाथ हिलाया

तो रुकना पड़ा उसे

"अरे भैय्या, सुना है तेरी बेटी किसी के साथ भाग गई,

कैसे हुआ? माज़रा क्या है?"

जिसके जवाब वो ख़ुद जानना चाहता था

वो सवाल उसके सर चढ़कर बोलने लगे

आँखोंमें दर्द के साएँ औरभी गहरे हो गएँ

वो इतना चूप रहा जैसे उसकी मौत हो गई हो

ख़ुलेआम मंदीरके सामनेभी

लोग कितनी आसानीसे ख़ून कर देते है...

5 comments:

  1. ..............

    कट्यार कलेजात गेली..

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  2. मरासिम नाही बघायचा..?
    open to all करावा का ?

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  3. Thanks Yogesh..
    Marasimcha mail kela aahe.

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  4. ख़ुलेआम मंदीरके सामनेभी

    लोग कितनी आसानीसे ख़ून कर देते है...

    ...

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