Saturday, January 29, 2011

Victim 1

लाँग डिस्टन्स कॉल्स ज्यादातर रातकोही आते है
उस रातभी आया था..
दिनभर सोचके रखा था उसने
उसको ये कहूँगा, वो बताऊँगा
शिकायतें जो चुभ रही थी कुछ दिनोंसे
उसे मख़मलसे ढ़क दूँगा..
"मैं यहाँ ख़ूष हूँ; वापस नही आऊँगी,
अलग होनाही ठिक है, गुडबाय"
उसे लगा, जो सुना वो शायद उसकी कल्पना है
लेकीन ख़यालोंमेंभी कभी इस बातने दस्तक नही दी; फिर?
थरथराते हाथोंमें फोन लेकर वो बैठा रहा
और देखता रहा उसकी तरफ़ कितनी देर..
किसी करीबवालेकी मौतकी ख़बर लेकर आए
इन्सानकी तरफ देख़ रहा हो जैसे..
सही बात है, किसीका ख़ून करनेके लिए
रुबरु होना जऱुऱी नही होता...

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