Wednesday, December 1, 2010

बस एक ही सुर में


एक ही लय में सुबह से

देख, कैसे बरस रहा है उदास पानी

फुहार के मलमली दुपट्टे से,

उड़ रहे हैं

तमाम मौसम टपक रहा है

पलक पलक रिस रही है

ये कायनात सारी

हर एक शै भीग-भीगकर देख

कैसी बोझल सी हो गयी है

दिमाग की गीली-गीली सोचों से

भीगी-भीगी उदास यादें टपक रही हैं

थके-थके से बदन में बस

धीरे-धीरे

सांसों का गर्म लोबान जल रहा है.

- गुलजार

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