Tuesday, January 5, 2010

Footprints



युँ इर्दगिर्द घूमती रहती है याँदे तुम्हारी

जैसे सुबह हाथोंमें मोगरेकी चंद सफ़ेद बूँदे
कुछ पलही समाई हो
लेकिन शाम ढलेभी उसकी खुशबू जायेही ना..!
अच्छा लगता है, महकता हुआ दिन..

किनारेकी गिली रेत मेरा वजन दिखाते हुए
पैरो के निशान बनाती है,
तो बगलमे गुनगुनाने लगते है तुम्हारे पैर..!
अच्छी लगती है, मुस्कराती हुई शाम..

बस य़ही चाहता हूँ
मुझे रिहा न करे ये कैद सुनेहरी
युँही इर्दगिर्द घूमती रहे याँदे तुम्हारी




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